19/09/2013

यहां हर कोई नहीं पहुंच सकता


‘आपका मेल मिला, मैं आपकी हर मुहिम में आपके साथ हूं।’
‘चलिए, किसीने तो जवाब दिया।’
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‘यह तसवीर कैसी लगा रखी है आपने?’
‘क्यों ठीक नहीं है क्या?’
‘नहीं, नहीं, बहुत गोरे हो रहे हैं आप तो।
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‘आपकी क़िताब तो आई नहीं अभी तक। जल्दी भेजिए...’
‘अरे, आप तो.....थोड़ा धैर्य रखा करें। अभी कोरियर कराके ही आ रहा हूं, रास्ते में ही हूं...’
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‘हमारे बड़े नेताजी का निधन हो गया है, आप इसपर कमेंट डालिए...
‘मैं क्यों डालूं ? नेता जी आपके हैं, मुझे क्या लेना ?’
‘तो फ़िर मैं आपको ब्लॉक......’
‘ज़रुर कीजिए, आपका तो रोज़ का काम है.....’
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‘आज शाम कुछ आतंकवादी जेल से भाग गए हैं, सज़ा पूरी होने में दो-चार दिन ही बाक़ी थे। ज़रुर कोई साजिश है। आप मेरे वॉल पे कमेंट करें....’
‘अरे मैं अभी सोकर उठा हूं, पहले ख़बर तो देख लूं ठीक से....
‘अरे, मैं क्या झूठ बोल रही हूं, टिप्पणी कीजिए......’
‘ठीक है, अभी एक वंचित वर्ग की महिला के साथ बलात्कार हो गया है, पहले आप उसपर टिप्पणी कीजिए.......’
‘हैं!’
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‘क़िताब मिल गई आपकी, यह क्या लिखा है आपने, क्या समीक्षा करवानी है...........
‘आप क्या कोई समीक्षक हैं! अरे ये आपका हौसला बढ़ाने के लिए है....’
‘क्यों, हमें क्या हौसले की कमी है?’
‘अरे, पहले ही दिन से क्या-क्या दुखड़े तो सुना रखे हैं आपने अपने......नहीं ठीक लगा तो मिटा दीजिए......’
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‘एक साहब लेखकों की डायरेक्ट्री निकाल रहे हैं, मेरा बायोडाटा इंग्लिश में है, आप हिंदी कर देंगे?’
‘भेज दीजिए, देखके बताऊंगा।
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‘यह तो बहुत लंबा है, एक पेज़ का मैटर बता दीजिए, कर दूंगा।’
‘एक पेज का....अच्छा मैं बता.....
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‘तीन दिन हो गए आपने बताया नहीं कुछ ?’
‘अभी टाइम नहीं है मेरे पास....’
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‘10 दिन हो गए आपने ट्रांसलेशन नहीं किया। अब उनका फ़ोन आ रहा है, बायोडाटा जल्दी भिजवाएं, अब मैं क्या करुं?’
‘मैंने तो आपसे रोज़ पूछा, आपने बताया ही नहीं, कौन-सा पोर्शन करना है?’
‘आप अपनी क़ाहिली को छुपा रहे हैं.....
‘देखिए, मुझसे आप यह ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ वाली हरकत मत कीजिएगा....मैं उस तरह का आदमी नहीं हूं.......’
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‘आए दिन आप ब्लॉक करते हो, आए दिन फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते हो, यह क्या नाटक है?’
‘मैंने कब भेजी? आपको यूंही लग रहा है!’
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‘आज फ़िर आपने यह लिंक भेज दिया। मैं भेज देता तो सुनने को मिलता कि अश्लील गाने भेजते हो!’
‘किसने भेजा, मैंने तो नहीं भेजा!’
‘कमाल है, आपको झूठ बोलने में महारत हासिल है या कोई मानसिक समस्या है?
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‘कविताएं नहीं भेजी आपने, प्लीज़ भेज दीजिए, बिलाल साहब रोज़ाना फ़ोन कर रहे हैं।’
‘अरे मेरी कोई रुचि अब रह नहीं गई है भेजा-भाजी में!’
‘मेरी ख़ातिर भेज दीजिए।’
‘अच्छा देखता हूं, मन हुआ तो आपको ही भेज दूंगा।’
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‘आज भी नहीं आईं आपकी कविताएं ; हमने तो पहले ही कहा था कि आप बीच रास्ते ही हमें छोड़ जाएंगे।’
‘छोड़ जाएंगे!? आपने तो हमेशा प्रगतिशील दिखाया है ख़ुदको! फ़िर यह छोड़ना
-पकड़ना कहां से आ गया ?’
‘अच्छा, आप कविताएं तो भेज दीजिए।’
‘भेज दी हैं।’
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‘आप ढूंढके दिखाईए हमें ; यहां हर कोई नहीं पहुंच सकता।’
‘देखिए इस तरह की पैंतरेबाज़ी में मैं यक़ीन नहीं रखता। अगर आपको मुझे बुलाना ही है तो सीधा कहिए। मैं आ जाऊंगा। बार-बार इस तरह की बातें न किया करें।’
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‘मन नहीं लग रहा आज...’
‘तो थाईलैंड में चले जाईए......’
‘मतलब..!?’
‘...............’
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‘फ़लां साहब शादी के पीछे पड़े हैं, हैंडसम हैं, अच्छा ख़ानदान है, जल्दी मचा रहे हैं....’
‘तो कर लीजिए। इसमें मुझे बताने की क्या बात है!? आपका पर्सनल मामला है। पूछना ही है तो अपने साहब से पूछिए.....’
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19-09-2013

(जारी)

(लिखी जा रही कहानी से कुछ अंश)

14/09/2013

काश! यह रात कभी ख़त्म न हो!


वह बिस्तर में पड़ा है, आंखें बंद हैं।

आंखें बंद कर लेने से क्या नींद आ जाती है ? रात किस वक्त आंख लगती है, कितना वक्त नींद आती है, कुछ समझ में नहीं आता। बस सुबह मन होता है कि सोया रहे, अभी तो नींद आनी शुरु ही हुई थी और......। यूं भी कोई चुस्ती-फुर्ती उसे अपने बदन में महसूस नहीं होती, फ़िर सुबह-सुबह तो बिलकुल ही थका-थका सा महसूस करता है ख़ुदको।

उठे भी तो किसलिए ?

जैसे-तैसे तैयार होकर स्कूल के लिए निकलेगा। सारे रास्ते आंखें नीची किए, सर झुकाए चलेगा। चलेगा कि घिसटेगा ! मौसम कैसा भी हो, हाथ-पांव पसीने से भरे रहेंगे। रास्ते में कहीं कोई कुत्ता दिख गया तो वह डरेगा, भौंक पड़ा तो बुरी तरह डर जाएगा। लड़कों का कोई झुण्ड दिख गया तो डरेगा, कहीं किसीसे नज़र न मिल जाए। पता नहीं कोई क्या कह दे, कोई ग़ाली न दे दे, कोई अजीब-सा इशारा न कर दे। स्कूल पहुंचेगा तो डरेगा कि कहीं कोई टीचर प्रेयर पढ़नेवाले तीन बच्चों में खड़ा न कर दे। कहीं अपनी क्लास की लाइन में आगे न खड़ा होना पड़ जाए। पीछे भी खड़ा है तो घबराया है कि कोई देख न ले कि वह प्रेयर नहीं बोल रहा है। बोलना तो दूर, उसके होंठ भी ठीक से नहीं हिल रहे।

फ़िर क्लास में!

किसी टीचर ने कुछ पूछ लिया तो ! उसे आता है कि नहीं आता, यह बड़ा सवाल नहीं है। मुश्क़िल यह है कि बोलेगा कैसे ? मुंह से आवाज़ निकलेगी कि अंदर ही कहीं फ़ंसी रह जाएगी !

आज तीसरा घंटा ख़ाली है। गणित वाले मास्साब नहीं आए हैं। सब बच्चे ख़ुश हैं। वे चिल्ला रहे हैं, कूद-फांद मचा रहे हैं। वह भी ख़ुश है। आज मास्साब का डर नहीं है। मगर अब एक नया डर उसके सामने है-बच्चों का डर।

ननुआ उसका हाथ मरोड़ेगा, वह कुछ भी नहीं कर पाएगा, बस कुनमुनाता रहेगा।

वह दादा टाइप लड़की आज फ़िर उसे धमकाकर उससे चॉक छीन लेगी। वह चुपचाप दे देगा।

हाफ़टैम (हाफ़टाइम/इंटरवल) में दूसरे बच्चों की तरह ही वह खाना खाने घर आएगा। और जब लौटकर वापिस जाएगा तो देखेगा, बस्ते में से उसका पैन ग़ायब है। आए दिन कोई उसका पैन चुरा लेता है, फ़िर भी आए दिन वह पैन बस्ते में ही छोड़कर खाना खाने चला जाता है।

स्कूल जाने के बाद पहले घंटे से आखि़री घंटे तक उसका एक-एक पल जैसे इसी इंतज़ार में बीतता है कि कब घंटा ख़त्म होगा, कब इंटरवल होगा, कब छुट्टी होगी।

छुट्टी होगी तो उसकी जान में ज़रा-सी जान आएगी।

खाना-वाना खाकर उसे नया पैन ख़रीदने भी जाना है। पैन के लिए मौक़ा देखकर माताजी या पापाजी के बक्से में से एक या दो रुपए, जो भी मिलें, निकाल लेने हैं। स्टोर में अकेले जाने में जान निकलती है। न जाने क्या-क्या सामान पड़ा है वहां। लाइट जलाई तो कोई देख लेगा। यूंही घुसा तो उसकी घबराहट अंधेरे को और घना कर देगी। पर पैसे तो निकालने हैं। बिना पैन के कल स्कूल कैसे जाएगा ?

पापाजी-माताजी को बताए क्या ? बताने से होगा क्या ? वे तो यही कहेंगे कि ‘होशियार बनते हैं ; ऐसे कैसे कोई पैन चुरा लेता है’। डांट भी सकते हैं कि ‘फ़लां लड़के को देख कितना तेज है, उससे कुछ सीख’। सरल के पास इन बातों का कोई जवाब नहीं है। यह उसे भी मालूम है कि होशियार होना चाहिए, तेज होना चाहिए। पर वह इसका क्या करे कि लाख सोचते रहने के बावजूद वह कोई कोशिश तक नहीं कर पाता!

वह डरता हुआ नमन की दुकान तक जाएगा, क्योंकि उसे मालूम है कि वहां भीड़ लगी होगी। सारे बच्चे और उनके मां-बाप कापी-पैन ख़रीदने वहीं आते हैं। वहां जाकर भीड़ के पीछे खड़ा हो जाएगा। फिर इंतज़ार करता रहेगा कि कब नमन की नज़र उसपर पड़ जाए और वह उससे पूछे कि हां, तुझे क्या चाहिए ? वह परेशान है कि आखि़र कब नमन की नज़र उसपर पड़ेगी और कब वह उससे पूछेगा! वह डर भी रहा है कि कहीं नमन की नज़र उसपर न पड़ जाए और वह उससे पूछ न ले! अगर पूछ लिया तो क्या वह तुरंत बता पाएगा कि उसे क्या चाहिए ? क्या उसकी आवाज़ नमन तक पहुंचेगी ? कहीं नमन उसकी हंसी तो नहीं उड़ाएगा कि तेरे मुंह में आवाज़ नहीं है? तू लड़की है क्या ?

वह डरा हुआ खड़ा है। एक डर उसे यह भी है कि कोई जान-पहचान वाला न यहां आ जाए और यह न देख ले कि वह डरा हुआ खड़ा है।

दिन इसी तरह निकलता है।

रात को बिस्तर में घुसता है तो आधी रात यही कामना करते बीतती है कि वक्त किसी तरह यहीं ठहर जाए। काश! यह रात कभी ख़त्म न हो!

(जारी)

14-09-2013

05/09/2013

पापई की शराफ़त भी आफ़त है!

पापाजी कभी-कभी हंसते हैं। अकसर गंभीर दिखाई देते हैं। दिखाई भी कितना देते हैं ! हमेशा तो बिज़ी रहते हैं।

पहले तो सभी कमरों में बल्ब लगे थे जो पीली-पीली रोशनी देते थे। एक-एक करके पापाजी ने सभी कमरों में ट्यूबलाइट लगवा दीं हैं। ट्यूबलाइट, स्विच ऑन करते ही बल्ब की तरह तुरंत नहीं जलती ; पहले फ़ड़फ़ड़ाती है। ज़्यादा देर फ़ड़फ़ड़ाए तो डर लगता है, आज जलेगी कि नहीं, वोल्टेज पूरे आ रहे हैं कि नहीं ! जल जाती है तो कितना अच्छा लगता है। अब कुछ भी काम करो, करने में मन लगेगा, मज़ा आएगा।

पापाजी हंसते हैं तो घर रोशनी से भर जाता है। सब भाई-बहिनों के दिल में जैसे लट्टू जलने लगते हैं। पापाजी कितने अच्छे हैं ! शराब नहीं पीते! सिगरेट नहीं पीते! ग़ाली नहीं बकते! किसीसे लड़ते नहीं। सफ़ेद कमीज़ और सफ़ेद पाजामा। हंसते हैं तो पता चलता है कि दांत उनसे भी ज़्यादा सफ़ेद हैं। शरीर इकहरा है और पेट एकदम सपाट है। और हो भी क्यों नहीं। कितना तो पैदल चलते हैं पूरा दिन। सुबह पांच बजे उठते हैं। बही-खाता लिखते रहते हैं। फ़िर दूध लाना, सब्ज़ी लाना..........दुनिया-भरके काम......दुकान पर जाना, ज़रुरत हो तो दोपहर में फ़िर घर आना...फ़िर जाना....रात को आना...खाना खाना....पौने नौ बजे के समाचार सुनना...और फ़िर बही-खाता.....पापाजी बस मेहनत, मेहनत, मेहनत, काम, काम और काम करते रहते हैं...फ़िल्म देखने भी नहीं जाते कभी। हां, किसीके घर शादी हो..... कोई मर गया हो.... कैसा भी अवसर हो, पापाजी की ज़रा भी जान-पहचान रही हो और पापाजी वहां न जाएं, हो ही नहीं सकता।

पापाजी जब पौने नौ के समाचार सुनते हैं तो सारे बच्चों को पता है कि अब बिलकुल भी नहीं बोलना। ज़रा कोई बोला नहीं कि ऐसी डांट पड़ेगी कि फ़िर रोटी खाए बिना सो जाने का मन होने लगेगा। पापाजी मारते हैं मगर न के बराबर। शायद साल में एक-दो बार, सिर्फ़ एक थप्पड़, पीछे गर्दन पर। थप्पड़ की ज़रुरत भी क्या है! वैसे ही जान निकली रहती है। एक बार तो भाई-बहिनों में से एक ने, दूसरे को यार बोल दिया था, पापाजी ने सुन लिया। ऐसी डांट लगाई कि बुरी तरह सहम गए सबके सब। लगा कि यार भी बहुत गंदी ग़ाली है, ठीक है, नहीं बोलेंगे अबसे।

बच्चे कुछ ऐसा मांग लें जो दिलाना पापाजी के लिए संभव न हो तो वे समझाते हैं कि लाल (बेटा/बच्चा) हमेशा अपने से नीचे लोगों को देखो। उन्हें देखो जिनके पास वो भी नहीं है जो तुम्हारे पास है। बच्चे चुप। वैसे तो बच्चे बोलते ही कभी-कभार हैं फ़िर पापाजी का अपना जीवन इतना सीघा-सादा है कि उनसें बोलें भी तो क्या बोलें! फ़िर ख़्याल भी तो कितना रखते हैं सबका। कोई बच्चा बीमार हो तो दिन में भी आते हैं दुकान छोड़कर। सरल तो आए दिन बीमार होता है। माताजी से दवाई नहीं लेता। माताजी से वैसे भी कोई ढंग से डरता नहीं है फ़िर सरल से दवाई खाई ही नहीं जाती। कोई एक दिन की बात हो तो भी बात है। जब देखो तब बीमारी। जब देखो तब मोटी-मोटी गोलियां, बड़े-बड़े कैपसूल-सबके सब कड़वे। हर बार पानी अंदर चला जाता है, गोली या तो बाहर आ जाती है या मुंह में ही कहीं चिपकी रह जाती है। इसलिए कई बार तो सिर्फ़ दवा खि़लाने के लिए दुकान छोड़कर घर आना पड़ता है पापाजी को। फ़िर सरल की नहीं चलती। पापाजी दोनों हाथ पकड़कर या पकडवाकर, चम्मच ज़बरदस्ती मुंह में घुसाकर, ऊंगली घुसाकर, कैसे न कैसे दवा खि़ला ही देते हैं। दवा खिलाने के वे बड़े पक्के हैं। कभी-कभी सुबह प्रोटीनेक्स या बोर्नविटा वाले दूघ के लिए भी ज़बरदस्ती करते हैं। मगर वो कभी-कभी की बात है। दवाई के मामले में पापाजी कोई समझौता मुश्क़िल से ही करते हैं। ख़ुद भी कई दवाईयां नियमित रुप से खाते हैं।

कई बार सुबह-सुबह जलेबी या तरबूज़ लेकर आते हैं और अपने हाथ से सबको देते हैं। वे कहते हैं कि तरबूज सुबह ही खाना चाहिए। वे ऐसी बातें बहुत बताते हैं। कभी कहते हैं कि खरबूज़े के ऊपर पानी नहीं पीते तो कभी कहते हैं कि रात को दही नहीं खाते। जब भी घर पर होते हैं ऐसा ही कुछ न कुछ बताते रहते हैं। क्या खाओ से ज़्यादा वे क्या न खाओ बताते रहते हैं। और बस दवाईयां और दवाईयां। कई बार वे रात को जब दूसरे सारे काम कर लेते हैं तो सरल के गले पर विक्स अपने हाथों से मलते हैं। सरल को उनका पास बैठना अच्छा लगता है पर बुरा यूं लगता है कि दवाईयां वे ज़्यादा ही घिस-घिसकर लगाते हैं। एक तो सरल की काया वैसे ही बहुत नाज़ुक है ऊपर से हर वक्त की बीमारियां। वह तंग आया रहता है फ़िर पापाजी के हाथ कभी-कभी ख़ुरदुरे से लगने लगते हैं, ख़ासकर जब वे ज़ोर-ज़ोर से दवा रगड़ते हैं। उसके गले में पहले ही भयानक दर्द है ऊपर से यह रगड़। यह दर्द घटा रही है कि बढ़ा रही है! मगर पापाजी के आगे वह वैसे ही बहुत कम बोलता है और विक्स वे कोई अपने लिए थोड़े ही लगा रहे हैं, उसीके भले के लिए लगा रहे हैं। दिन भर के थके हुए तो आते हैं फ़िर भी देर रात जागकर उसे विक्स लगा रहे हैं। वह क्या कहे ! चुपचाप पड़ा लगवाता रहता है। पापाजी सरल का बहुत ज़्यादा ध्यान रखते हैं।

‘ए पिंटू! कैंची रख दे! लग जाएगी हाथ में! पहले भी कितनी बार मना किया है! चल रख!’

सरल कांप जाता है।

‘ए पिंटू! खाट मत उठा! तुझसे नहीं उठेगी! चल छोड़ दे, मैं उठाता हूं।’

सरल घबरा जाता है।

सरल को कुछ-कुछ अच्छा तो लगता है कि पापई कितना ध्यान रखते हैं, पर अंदर कहीं शायद बुरा भी लगता है। कैंची उठाने में इतना ज़ोर से डांटने की क्या बात है! वे बात-बात में ऐसा क्यों कहते हैं कि तुझसे नहीं होगा! शायद वह अभी छोटा है, इसलिए कहते होंगे। वे उसका बुरा क्यों चाहेंगे? बुरा चाहने वाला आदमी क्या इतना ख़्याल रखता है!

दूसरे घरों में ‘नंदन’ या ‘चंदामामा’ जैसी पत्रिकाएं आतीं हैं जिनमें अकसर भूत-प्रेत या राजा-रानी की कहानियां होती हैं। मगर पापाजी ने उन्हें ‘पराग’, सरिता और ‘धर्मयुग’ जैसी पत्रिकाएं लगाके दी हैं। ‘पराग’ सरल को बहुत अच्छा लगता है। उसमें जैसे बिलकुल उसीके जैसे बच्चों की कहानियां होती हैं। कई कहानियां तो बच्चों की समस्याओं पर भी होतीं हैं। पापाजी को कौन बताता है इतनी अच्छी-अच्छी क़िताबों के बारे में! वे बोलते इतना कम हैं कि समझ में नहीं आता उनके दिल में क्या-क्या भरा है। एक बार रात को जब दुकान से आए तो बही-खातों वाले थैले में से एक पार्सल जैसा निकाला। फ़िर बड़े आराम से उसे खोला। वे किसी काम में जल्दी नहीं मचाते, हर काम धीमे-धीमे, करीने से करते हैं। पार्सल में से एक रंग-बिरंगी, चमचमाती हुई क़िताब निकल आई है। पापाजी सामने न बैठे होते तो बच्चे देखते ही लड़ने लगते कि ‘पहले मैं पढ़ूंगी’, ‘नहीं पहले मैं पढ़ूंगा’। क़िताब का नाम है ‘योगीराज’। दिल्ली प्रेस का प्रकाशन। पता नहीं पापाजी ने कब इसके बारे में पढ़ा होगा, कहां पढ़ा होगा, क्यों उन्हें लगा होगा कि यह बच्चों के लिए अच्छी रहेगी, कब, कैसे उन्होंने ऑर्डर दिया होगा! हमें क्या! हमें तो अब पहले क़िताब पढ़नी है, बाद में कुछ और करना है। यह कहानी है एक ढोंगी बंदर की जो कहीं एक आश्रम बना कर, छोटे-मोटे चमत्कार दिखाकर भक्तों को ठगता है। एक दिन जंगल के दूसरे जानवर प्लान बनाकर उसकी पोल खोल देते हैं और वह पकड़ा जाता है।

हम सब बच्चों को ऐसी क़िताबें ख़ूब भातीं हैं। सरल की तो यह ख़ास पसंद है। पापाई कई बार हमें यूंही सरप्राइज़ दे देते हैं।

(जारी)

05-09-2013


02/09/2013

वह दूसरों के जैसा नहीं है!


सौ में से निन्यानवें बार ऐसा होता है। वे सब उसके खि़लाफ़ एक हो जाते हैं। जब कभी वह घर से निकलता है, गांडू-गांडू कहकर चिल्लाते हैं, पीछे आते हैं।

कस्बा जिसमें उसका जन्म हुआ, अखाड़ेबाज़ी और लौंडेबाज़ी के लिए मशहूर है। अखाड़ेबाज़ी के शौक़ीन लोगों में से कईयों को लौंडेबाज़ी की आदत हो जाती है, ऐसा माना और बताया जाता है। जो इस आदत का शिकार बनते हैं, उन्हें गांडू कहा जाता है। और डरपोक आदमी को भी यहां गांडू कहा जाता है।

मगर ये सब तो उसके दोस्त ही हैं जो उसे गांडू कहते हैं। हमेशा नहीं कहते। उसके साथ खेलते हैं, हंसते हैं, आते-जाते हैं, मिलते-जुलते हैं। मगर कभी-कभी एकाएक न जाने क्या होता है कि वे सब एक तरफ़ और वह एक तरफ़।

वह पीला, कमज़ोर, डरपोक, घुग्घू और भौंदू-सा बच्चा। उसे पता ही नहीं चलता कि ऐसा क्या हुआ कि एकाएक वे सब उसके खि़लाफ़ हो गए!

वह जब इस घर में आया था तो आते ही उसे टाइफ़ाइड हो गया था। और वह बहुत कमज़ोर हो गया था। पहले कैसा था उसे याद नहीं। मगर इतना याद है कि टाइफ़ाइड ठीक होने के बाद दोबारा चलना सीखा था उसने। मां हाथ पकड़कर ऐसे ही चलाती जैसे छोटे बच्चे को सिखाते हैं।

कभी-कभी दिलबर चुपचाप पीछे से आता है और उसकी टांग में अपनी टांग अड़ा देता है। वह धड़ाम से नीचे आ गिरता है। सब बच्चे हंसने लगते हैं। कोई भी दिलबर से नहीं कहता कि ऐसा क्यों कर रहे हो! एक तो बिना बात किसीको गिरा रहे हो। और पीछे से आकर धोखे से गिरा रहे हो! फ़िर हंस रहे हो!

कौन कहेगा! वे तो ख़ुद भी हंसते हैं। उनके बाप खड़े हों तो बाप भी हंसते हैं, मांएं खड़ी हों तो माएं भी हंसतीं हैं, बहिनें खड़ी हों तो बहिनें भी हंसतीं हैं।

उसका मन क्यों नहीं होता कि किसीको धोखे से गिरा दे और हंसे। क्या यह दुनिया उसके जैसे लोगों के लिए नहीं है! क्या उसके जैसा होना बुरी बात है, अपराध है, हंसने की बात है! क्या जीने के लिए उसे भी इनके जैसा बनना होगा !

02-09-2013

(जारी) 
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